कुरुद में पराली जलाना जारी, प्रशासन की अपील बेअसर

कुरुद । क्षेत्र में पराली जलाना लगातार बढ़ती पर्यावरणीय चिंता का विषय बन गया है। जिला प्रशासन द्वारा बार-बार अपील और जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद किसान खेतों में धड़ल्ले से पराली जला रहे हैं। धान कटाई के बाद खेतों में बिखरे पैरा को जलाकर दलहन फसल की तैयारी की जा रही है, जिससे मिट्टी की उर्वरता, हवा की गुणवत्ता और मित्र कीटों का प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है।

प्रशासन की अपील का नहीं दिखा असर

खरीफ सीजन की समाप्ति के बाद जिला प्रशासन ने किसानों से फसल अवशेष न जलाने की सख्त अपील की थी। इसके बावजूद गांवों में पराली जलाना बदस्तूर जारी है। हार्वेस्टर से कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में पैरा बच जाता है जिसे कई किसान जलाकर अगली फसल की तैयारी करते हैं।
मैदानी अमला भी इस पर प्रभावी रोक नहीं लगा पा रहा है, जबकि शासन ने फसल अवशेष जलाने पर जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान कर रखा है।

किसान नेताओं की चिंता – स्वास्थ्य और मिट्टी पर पड़ रहा गंभीर प्रभाव
“पराली जलाना पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए खतरा”

भारतीय किसान संघ जिलाध्यक्ष लालाराम चंद्राकर ने स्पष्ट कहा कि पराली जलाना न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी कम करता है। उन्होंने बताया कि सरकार अवशेष प्रबंधन के लिए तकनीकी सहयोग दे रही है और किसानों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

जहरीली गैसें बढ़ा रहीं खतरा

भरदा के प्रगतिशील किसान लेखराज चंद्राकर का कहना है कि फसल अवशेष जलाने से उठने वाले धुएं में कई जहरीली गैसें होती हैं, जो मानव स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। इससे अस्थमा, फेफड़ों के संक्रमण और कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ रहा है।

मिट्टी के जीव नष्ट, कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ी

किसान पप्पू दाऊ ने बताया कि पराली जलाना मिट्टी में मौजूद लाभकारी केंचुए, सूक्ष्मजीव और मकड़ियों को खत्म कर देता है। इससे प्राकृतिक कीट नियंत्रण तंत्र कमजोर पड़ता है और किसानों को महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर होना पड़ता है।

विभागों के बीच समन्वय की कमी

कुरुद के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी जितेंद्र सोनकर ने कहा कि किसानों को पराली न जलाने की लगातार समझाइश दी जाती है। लेकिन कार्रवाई तभी संभव है जब राजस्व विभाग द्वारा खसरा जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
उन्होंने संयुक्त सर्वे की आवश्यकता बताते हुए कहा कि दोनों विभाग मिलकर ही दोषी किसानों की पहचान सुनिश्चित कर सकते हैं।

समाधान क्या है?

पराली जलाना रोकने के लिए कई समाधान मौजूद हैं—

  • अवशेष प्रबंधन मशीनों का उपयोग

  • पैरा से खाद, चारा और ऊर्जा उत्पादन

  • कम्पोस्टिंग और इन-सीटू मैनेजमेंट

  • सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी का लाभ

पराली जलाना एक गंभीर चुनौती

कुल मिलाकर, कुरुद क्षेत्र में पराली जलाना सिर्फ किसानों की सुविधा का मामला नहीं रहा, बल्कि यह पर्यावरण, स्वास्थ्य और कृषि की स्थिरता पर गहरा असर डाल रहा है। प्रशासन, विभागों और किसानों को मिलकर समाधान अपनाना होगा ताकि भविष्य में इस समस्या को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सके।

 

Bharti Sahu
Author: Bharti Sahu

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