एसईसीएल केस में हाईकोर्ट सख्त, कंस्ट्रक्शन कंपनी की याचिका खारिज

छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अनुबंध में मध्यस्थता यानी आर्बिट्रेशन की शर्त होने मात्र से वैधानिक कर या सेस से जुड़े विवादों का समाधान मध्यस्थ के माध्यम से नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha की खंडपीठ ने कहा कि जब कोई विवाद किसी विशेष कानून के तहत उत्पन्न वैधानिक देनदारी से जुड़ा हो, तब संबंधित पक्ष को उसी कानून के अंतर्गत निर्धारित वैधानिक मंच का सहारा लेना होगा। अदालत ने इसी आधार पर कोलकाता की निर्माण कंपनी एसके सामंता एंड कंपनी की याचिका खारिज कर दी, जिसमें एसईसीएल द्वारा काटे गए कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस को चुनौती दी गई थी।

मामला South Eastern Coalfields Limited के गेवरा ओपन कास्ट प्रोजेक्ट में वर्कशॉप और स्टोर निर्माण कार्य से जुड़ा था। यह ठेका एसके सामंता एंड कंपनी को दिया गया था। निर्माण कार्य के भुगतान के दौरान एसईसीएल ने 1 प्रतिशत राशि कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस के रूप में काटकर राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी थी। कंपनी ने इस कटौती को गलत बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की और दावा किया कि उसका कार्य खनन क्षेत्र में किया गया था, इसलिए उस पर माइंस एक्ट लागू होता है। कंपनी का कहना था कि बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट के तहत सेस की कटौती वैध नहीं है और काटी गई राशि वापस दिलाने के लिए मध्यस्थ नियुक्त किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान एसईसीएल की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने केवल संग्रहण एजेंसी के रूप में कार्य किया और नियमानुसार कटौती की गई राशि राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी गई है। ऐसे में रिफंड की जिम्मेदारी एसईसीएल की नहीं बनती। वहीं राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि संबंधित कंपनी ने कोयला खनन नहीं बल्कि निर्माण कार्य किया था, इसलिए उस पर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस लागू होता है और कटौती पूरी तरह वैध है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि कंपनी को टेंडर प्रक्रिया के दौरान ही यह जानकारी थी कि भुगतान से 1 प्रतिशत सेस काटा जाएगा। कंपनी ने सभी शर्तों को स्वीकार करते हुए अनुबंध किया था, इसलिए बाद में उसे विवाद का विषय नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि सेस की वसूली केवल दो निजी पक्षों के बीच वित्तीय लेनदेन का मामला नहीं बल्कि एक वैधानिक दायित्व है। ऐसे मामलों में मध्यस्थता प्रक्रिया लागू नहीं होती और संबंधित कानून के तहत उपलब्ध मंच का ही उपयोग करना होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर भविष्य में सरकारी परियोजनाओं और निर्माण अनुबंधों से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है। इससे यह स्पष्ट संकेत गया है कि सरकारी कर, सेस और वैधानिक दायित्वों से जुड़े विवादों में अनुबंध की आर्बिट्रेशन क्लॉज को अंतिम आधार नहीं माना जाएगा। मामले से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट देखी जा सकती है।

Annu Dewangan
Author: Annu Dewangan