रायपुर। लगातार सघन खेती और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की सेहत बिगड़ने और उपजाऊ क्षमता घटने की समस्या तेजी से सामने आ रही है। इस स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह दी है, जिसे मिट्टी को पुनर्जीवित करने का एक प्राकृतिक, सस्ता और टिकाऊ तरीका माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद के उपयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि फसलों की पैदावार में भी उल्लेखनीय सुधार होता है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ढैंचा, सनई, लोबिया और मूंग जैसी फसलें हरी खाद के रूप में सबसे अधिक उपयोगी मानी जाती हैं। ये फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाती हैं, जिससे भूमि की गुणवत्ता बेहतर होती है। इसके साथ ही हरी खाद मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाकर उसे भुरभुरा बनाती है, जिससे जड़ों का विकास बेहतर होता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हरी खाद के उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता भी बढ़ती है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम हो जाती है और पानी की बचत होती है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद तैयार करने की प्रक्रिया भी सरल है। रबी फसल की कटाई के बाद खेत में ढैंचा या सनई जैसे बीज बोए जाते हैं और लगभग 45 से 55 दिनों के भीतर जब फसल फूल आने की अवस्था में होती है, तब उसे खेत में जोतकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। इसके बाद हल्की सिंचाई कर 10 से 15 दिनों तक छोड़ दिया जाता है, जिससे यह सड़कर प्राकृतिक खाद में बदल जाती है। इस प्रक्रिया से मिट्टी का पीएच स्तर संतुलित रहता है और क्षारीय व लवणीय भूमि को सुधारने में भी मदद मिलती है।
कृषि विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि हरी खाद के नियमित उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस विधि को अपनाकर अपनी भूमि की उर्वरता को बनाए रखें और बेहतर उत्पादन प्राप्त करें। साथ ही किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या विभागीय कार्यालय से संपर्क कर इस संबंध में प्रशिक्षण और बीज पर मिलने वाली सब्सिडी की जानकारी प्राप्त करें। इस विषय में अधिक जानकारी के लिए कृषि मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट https://agricoop.nic.in/ पर भी जानकारी उपलब्ध है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ हरी खाद को अपनाते हैं, तो यह न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को दीर्घकाल तक बनाए रखेगा, बल्कि टिकाऊ कृषि की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।







