नई दिल्ली, 7 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण को लेकर दिए गए हालिया बयान के बाद देश में एक बार फिर सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। गुरुवार को अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य समाज में समानता और पिछड़े वर्गों के उत्थान से जुड़ा है। जब तक सामाजिक असमानता बनी हुई है और संबंधित वर्गों को इसकी आवश्यकता महसूस होती है, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरक्षण के माध्यम से आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें अपने ही समाज के अन्य जरूरतमंद लोगों के लिए अवसर छोड़ने की मानसिकता पर विचार करना चाहिए।
भागवत के बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने आरक्षण को केवल राजनीतिक मुद्दे के बजाय सामाजिक न्याय और संवेदनशीलता से जोड़कर देखने की बात कही। आरएसएस की आधिकारिक वेबसाइट पर भी संघ का यह रुख दर्ज है कि संविधान के तहत वैध आरक्षण का समर्थन किया जाना चाहिए और जब तक लाभार्थी वर्ग इसकी आवश्यकता महसूस करता है, तब तक संघ उसके साथ खड़ा रहेगा। संघ ने इससे पहले भी कहा है कि सदियों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को बराबरी पर लाने के उद्देश्य से आरक्षण को जारी रखना आवश्यक है।
आरक्षण को लेकर भागवत के बयान के बाद राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा तेज होने की संभावना है। हालांकि, इस बयान का अर्थ आरक्षण समाप्त करने की घोषणा के तौर पर नहीं निकाला जा सकता। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण से संबंधित प्रावधान संविधान के अलग-अलग अनुच्छेदों में मौजूद हैं। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की जानकारी के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 16(4) राज्य को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पदोन्नति से संबंधित प्रावधान भी संविधान में किए गए हैं। Department of Personnel and Training
ऐसे में भागवत का बयान आरक्षण खत्म करने की बजाय इसके उद्देश्य, जरूरत और लाभ के समान वितरण पर केंद्रित दिखाई देता है। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से भी यह बयान महत्वपूर्ण है, क्योंकि आरक्षण भारत की राजनीति में लंबे समय से सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और चुनावी समीकरणों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा रहा है। आने वाले समय में इस बयान को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि संघ प्रमुख के बयान ने आरक्षण को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। संविधान और आरक्षण से जुड़े प्रावधानों की आधिकारिक जानकारी भारत सरकार के विधायी विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध है।







