
नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए में लगातार दर्ज हो रही गिरावट ने देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब दोनों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है और एक डॉलर की कीमत लगभग 96 रुपए तक पहुंचने की चर्चा आर्थिक गलियारों में तेज है। ऐसे समय में जब भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है, रुपए की कमजोरी ने नीति निर्माताओं और आर्थिक विश्लेषकों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर तब, जब एशिया के कई अन्य देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रुपए पर दबाव बढ़ने की बड़ी वजह भारत का बढ़ता आयात बिल, कच्चे तेल पर निर्भरता, विदेशी निवेश की अस्थिरता और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती है। जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तब विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर डॉलर आधारित परिसंपत्तियों में निवेश बढ़ाते हैं, जिससे भारतीय मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। दूसरी ओर, कई एशियाई देशों ने निर्यात बढ़ाने, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रखने और विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने के जरिए अपनी मुद्राओं को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखा है। इसी कारण कुछ एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी डॉलर के मुकाबले उतनी तेजी से कमजोर नहीं हुई है।
यदि पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मई 2014 में जब केंद्र में एनडीए सरकार सत्ता में आई थी, तब एक डॉलर की कीमत करीब 58.94 रुपए थी। इसके बाद 2019 में यह दर 69.37 रुपए तक पहुंची और जून 2024 में तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के समय रुपया लगभग 83.38 के स्तर पर था। मौजूदा परिस्थितियों में रुपए के 96 के करीब पहुंचने की चर्चा ने चिंता बढ़ा दी है। कुल मिलाकर बीते 12 वर्षों में भारतीय मुद्रा में 62 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज होने का अनुमान जताया जा रहा है। हालांकि इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भी रुपए में गिरावट देखी गई थी और 2004 से 2014 के बीच मुद्रा करीब 31 प्रतिशत से अधिक कमजोर हुई थी। इससे स्पष्ट है कि रुपए का उतार-चढ़ाव केवल किसी एक सरकार की आर्थिक नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, घरेलू मांग और वित्तीय प्रबंधन से भी गहराई से जुड़ा विषय है। रुपए की कमजोरी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, दवाइयों और विदेश से आयात होने वाले उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है, जिसका असर अंततः आम उपभोक्ता के मासिक बजट पर दिखाई देता है। मुद्रा बाजार और विनिमय दर से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट देखी जा सकती है: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)







