रायपुर। बस्तर के घने जंगलों में कभी हथियार लेकर चलने वाली आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने अब हिंसा से दूर नई जिंदगी की ओर कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय सभागार में आयोजित राज्य स्तरीय बुनकर सम्मेलन में नौ आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने स्वदेशी हथकरघा और कोसा सिल्क से तैयार परिधानों में रैंप वॉक किया। सुकमा जिले की आठ और बीजापुर की एक महिला ने इस विशेष प्रस्तुति में हिस्सा लिया। मंच पर जब ये महिलाएं फेमिना मिस इंडिया छत्तीसगढ़ अनुष्का सोन के साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं तो सभागार तालियों से गूंज उठा। यह आयोजन उनके जीवन में आए बदलाव और मुख्यधारा में लौटने के बाद बढ़ते आत्मविश्वास की झलक भी बना।
सुकमा जिले के चिंतागुफा क्षेत्र के एल्मागुंडा गांव की 22 वर्षीय पुनेम ज्योति ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें इतने बड़े मंच पर रैंप वॉक करने का अवसर मिलेगा। ज्योति ने पिछले वर्ष दिसंबर में हैदराबाद में आत्मसमर्पण किया था। उनका कहना है कि माओवादी संगठन छोड़ने के बाद उनकी जिंदगी में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं। कार्यक्रम में शामिल 28 वर्षीय एक अन्य पूर्व महिला नक्सली ने बताया कि जंगल में रहते हुए उन्होंने कभी फैशन शो नहीं देखा था, लेकिन संगठन के सांस्कृतिक प्रभाग चेतना नाट्य मंडली से जुड़े रहने के कारण उन्हें लोगों के सामने प्रस्तुति देने का अनुभव था। इसी अनुभव ने उन्हें रैंप पर आत्मविश्वास के साथ चलने में मदद की।
आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं की जिंदगी अब धीरे-धीरे नई दिशा में आगे बढ़ रही है। कभी माओवादी संगठन के प्रभाव वाले इलाकों में रहने वाली ये महिलाएं अब रोजगार, प्रशिक्षण और सामाजिक पुनर्वास के जरिए सामान्य जीवन में लौटने का प्रयास कर रही हैं। हथकरघा और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की पहल उन्हें कौशल के साथ आजीविका का अवसर भी दे सकती है। ऐसे आयोजनों में उनकी भागीदारी केवल मंच पर प्रस्तुति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के सामने उनके बदले हुए जीवन की तस्वीर भी पेश करती है। सरकार और संबंधित संस्थाओं की ओर से आत्मसमर्पित लोगों के पुनर्वास और उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि वे स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस और बुनकरों से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी छत्तीसगढ़ शासन के ग्रामोद्योग विभाग और संबंधित सरकारी पोर्टलों पर उपलब्ध है।
इन महिलाओं का रैंप पर उतरना बस्तर में हिंसा छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ने की प्रक्रिया का एक मानवीय पक्ष सामने लाता है। बंदूक और जंगल के जीवन से निकलकर स्वदेशी परिधानों में मंच पर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाना इस बात का संकेत है कि पुनर्वास केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन और समाज में अपनी पहचान दोबारा बनाने का अवसर देने की प्रक्रिया भी है।https://cg.gov.in/?utm_source=chatgpt.com







