बालोद। खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में किसान धान की रोपाई की तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे समय में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बालोद ने किसानों को खेती की लागत कम करने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए हरी खाद अपनाने की सलाह दी है। मृदा विशेषज्ञ एआर गौर के अनुसार, धान की रोपाई से पहले खेतों में ढेंचा, सनई, मूंग या उड़द जैसी दलहनी फसलों की बुआई करने से मिट्टी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है, उत्पादन लागत कम होती है और लंबे समय तक भूमि की उत्पादक क्षमता भी बनी रहती है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते कृषि परिदृश्य में यह तकनीक किसानों के लिए कम लागत में अधिक उत्पादन का प्रभावी विकल्प साबित हो सकती है।
मृदा विशेषज्ञ एआर गौर ने बताया कि यदि किसान ढेंचा की खेती बीज उत्पादन के लिए करना चाहते हैं तो जून से जुलाई का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। वहीं यदि इसका उपयोग हरी खाद के रूप में करना है तो धान की नर्सरी तैयार करने से लगभग 10 से 12 दिन पहले खेत में इसकी बुआई कर देनी चाहिए। यह फसल 30 से 35 दिनों में तैयार हो जाती है, जिसके बाद इसे हल या ट्रैक्टर की सहायता से मिट्टी में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया से फसल पूरी तरह सड़कर प्राकृतिक खाद में बदल जाती है और खेत को पर्याप्त मात्रा में जैविक पोषक तत्व उपलब्ध कराती है। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है और किसान प्रति एकड़ लगभग 30 किलोग्राम तक यूरिया की सीधी बचत कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ढेंचा जैसी हरी खाद वाली फसलों को मिट्टी में मिलाने से जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जिससे भूमि की संरचना मजबूत होती है और जल धारण क्षमता में सुधार आता है। साथ ही मिट्टी का पीएच मान संतुलित बना रहता है, जिससे पहले से मौजूद फास्फोरस, पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों को आसानी से उपलब्ध हो पाते हैं। इसका सीधा लाभ धान की फसल की बेहतर बढ़वार और अधिक उत्पादन के रूप में मिलता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, ऐसे में हरी खाद का प्रयोग भूमि की सेहत सुधारने का टिकाऊ और वैज्ञानिक तरीका है।
ढेंचा की खेती करना किसानों के लिए सरल और कम खर्च वाला विकल्प है। एक एकड़ खेत के लिए लगभग 8 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। इसकी बुआई के लिए खेत की सामान्य जुताई करने के बाद बीजों का समान रूप से छिड़काव किया जाता है और फिर हल्की जुताई कर बीजों को मिट्टी से ढक दिया जाता है, जिससे अंकुरण बेहतर होता है। यदि बुआई के बाद तीन से चार दिनों तक बारिश नहीं होती है तो हल्की सिंचाई करना आवश्यक माना गया है। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक सलाह के अनुसार हरी खाद तकनीक अपनाकर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखें और रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करें। इससे न केवल खेती अधिक लाभकारी बनेगी बल्कि भविष्य में भूमि की उत्पादक क्षमता भी सुरक्षित रहेगी। हरी खाद तकनीक और प्राकृतिक खेती से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की आधिकारिक वेबसाइट https://icar.org.in पर भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।







