नागपंचमी पर यहां नागों की तरह हरकतें करने लगते हैं लोग, जानिए अनोखी मान्यता

 

जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के समीप स्थित सिटोंगा गांव नागपंचमी के अवसर पर आयोजित होने वाले अपने अनोखे नाग दरबार के लिए जाना जाता है। खेतों के बीच बने नागदेवता के छोटे से मंदिर में हर साल नागपंचमी पर विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसमें आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस स्थान का संबंध बांकी और श्री नाम के दो भाई-बहन से है, जिन्हें यहां नाग और नागिन के रूप में पूजा जाता है। इसी आस्था के चलते नागपंचमी के दिन सिटोंगा में विशेष धार्मिक आयोजन होता है।

मंदिर के पुजारी लहरू बाबा के अनुसार, यहां स्थापित प्रतिमाओं को बांकी और श्री से जोड़ा जाता है। प्रचलित लोककथा के मुताबिक दोनों भाई-बहन गरीब परिवार से थे और अपनी सौतेली मां के व्यवहार से परेशान रहते थे। एक दिन उन्हें भूखे-प्यासे खेत की रखवाली के लिए भेज दिया गया। लोककथा में बताया जाता है कि खेत में सांप के दो अंडे मिलने के बाद दोनों ने उन्हें पकाकर खा लिया, जिसके बाद उनके शरीर में सर्प रूप आने लगा। इसके बाद दोनों खेत में बने एक कुंड में जाकर छिप गए। जब माता-पिता उन्हें खोजने पहुंचे तो दोनों अलग-अलग दिशाओं में चले गए। जनश्रुति के अनुसार बांकी पश्चिम की ओर और श्री पूर्व दिशा की ओर गईं और आगे चलकर इन्हीं के नाम से बांकी और श्री नदियों का उद्गम हुआ। इसी वजह से स्थानीय समाज इन दोनों नदियों को भाई-बहन के रूप में मानकर उनकी पूजा करता है।

सिटोंगा के नाग दरबार की सबसे चर्चित मान्यता नागपंचमी के दिन दिखाई देने वाली धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पूजा-अर्चना के दौरान कुछ श्रद्धालु ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं, जिसमें वे जमीन पर रेंगने लगते हैं और नाग जैसी मुद्राएं बनाने लगते हैं। आस्थावान इसे नागदेवता की कृपा या उनके सवार होने से जोड़कर देखते हैं। हालांकि इन घटनाओं को धार्मिक और लोकविश्वास के संदर्भ में ही देखा जाता है, क्योंकि इनके पीछे किसी वैज्ञानिक कारण की पुष्टि इस जानकारी में नहीं है।

मान्यता के अनुसार ऐसी अवस्था में पहुंचे श्रद्धालुओं को नदी के पास स्थित पवित्र कुंड में स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें दूध पिलाने की परंपरा बताई जाती है, जिसके बाद वे सामान्य अवस्था में लौट आते हैं। नागपंचमी के दिन इस अनोखे आयोजन को देखने और नागदेवता की पूजा करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु सिटोंगा पहुंचते हैं। बांकी और श्री नदियों से जुड़ी लोकआस्था, नागदेवता की पूजा और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के कारण सिटोंगा का नाग दरबार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का एक अलग स्वरूप सामने रखता है। आयोजन में भीड़ बढ़ने की स्थिति में श्रद्धालुओं को स्थानीय व्यवस्था, स्वच्छता और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करना जरूरी है।

सिटोंगा नाग दरबार से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए दक्षिण कोसल की संबंधित रिपोर्ट देखी जा सकती है।

Annu Dewangan
Author: Annu Dewangan