नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 22 वर्षों से अधिक समय से उम्रकैद की सजा काट रहे ओडिशा के एक कैदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए उड़ीसा हाई कोर्ट के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायालयों को ऐसे मामलों में केवल तकनीकी आधार पर फैसला देने के बजाय व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने हाई कोर्ट के उस आदेश को “बेहद चिंताजनक” बताया, जिसमें लगभग नौ साल की देरी से दायर आपराधिक अपील को सुनवाई से पहले ही खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कम से कम दोषी को अपनी अपील पर मेरिट के आधार पर बहस करने का अवसर दिया जाना चाहिए था।
मामला अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को ओडिशा के नबरंगपुर स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए 25 अगस्त 2006 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में उसकी ओर से दायर आपराधिक अपील में 3157 दिनों की देरी हुई, जिसे उड़ीसा हाई कोर्ट ने पर्याप्त कारण न होने का हवाला देकर खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि जेल से भेजे गए अपील मेमो में देरी माफ करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब अपील दायर की गई थी, तब तक याचिकाकर्ता 12 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका था और यह तथ्य कि अपील जेल के माध्यम से दायर की गई थी, अपने आप में सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाने के लिए पर्याप्त था। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल तकनीकी बाधाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिले। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता पिछले 22 वर्षों से लगातार जेल में बंद है और इस दौरान उसे एक बार भी पैरोल या फर्लो पर रिहा नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान कोरापुट सर्कल जेल के वरिष्ठ अधीक्षक द्वारा जारी आचरण प्रमाणपत्र भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसमें कैदी का व्यवहार संतोषजनक बताया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि उसके खिलाफ जेल में कभी कोई प्रतिकूल टिप्पणी या अनुशासनात्मक कार्रवाई दर्ज नहीं हुई। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए याचिकाकर्ता को 10 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत देने का आदेश दिया। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह कैदी को लागू रिमिशन नीति के तहत सजा में छूट के लिए आवेदन तैयार करने में सहायता प्रदान करे। अदालत ने मामले को अनुपालन रिपोर्ट के लिए 28 मई को सूचीबद्ध किया है। सुप्रीम Court और न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए Supreme Court of India की आधिकारिक वेबसाइट देखी जा सकती है।







